नागपुर में हिंदुओं को इस बात से शिकायत थी कि पुलिस को फोन किया तो दो घंटे बाद
जिस शहर की आबादी में 70 प्रतिशत हिन्दू थे वहां 12 से 15 प्रतिशत वाले शांतिदूतों से पत्थर खाते रहे अपनी संपतियों का नुकसान करवाते रहे 25 हजार 1 लाख के फोन से वीडियो बनाते रहे सुरक्षा के लिए जो वीडियो कैमरे लगवाए थे उन्हें भी उखाड़ के फेंक दिया गया
लाखों रु की गाड़ी ले ली थी कि दुनिया को दिखाऊंगा हमने जीवन में क्या अर्जित किया है करोड़ों रु का मकान बनवाया ताकि दुनिया को दिखा सके अपना कितना भौकाल है देखो मेरी लाइफ स्टाइल हम ऐसे राजे महाराजा की तरह अपना जीवन यापन करते है
जमीन और संपतियों का ज्यादा बटवारा न हो इस लिए एक से दो ही बच्चे पैदा किए ताकि परिवार ही बोझ न बने खुद आधुनिकवादी होने की चेष्टा करते रहे मगर खुद को सुरक्षित रखने के लिए एक तलवार नहीं ले सके छत की मुडेर पर दो चार ईंटे भी नहीं रख सके दस पांच हजार का कोई हथियार भी नहीं रख सके तुम्हारे घर के नीचे भीड़ तांडव करती रही और तुम एक सिलेंडर में आग लगा कर छत से नीचे भी नहीं फेंक सके
ऐसे तो डर डर के तुम अपना जीवन व्यतीत कर रहे हो सोच रहे थे पुलिस को फोन कर देते है पुलिस आकर बचा लेगी जब तुम मरने से इतना डर रहे हो कि अपनी लड़ाई तुम खुद नहीं लड़ सकते तो तुम्हारे लिए पुलिस क्यों अपना जीवन दाव पर लगाए ? उन पुलिस वालों के बच्चे नहीं है क्या ? उन्हें फिकर नहीं हो रही होगी कि उनके बाद उनकी फैमिली का क्या होगा ?
शायद यही सोच के पुलिस भी लेट आई की मामला रफा दफा हो जाने दो बाद में कार्यवाही कर लेंगे ? अगर तुम लोग खुद उस लड़ाई में कूद गए होते तो शायद पुलिस भी टाइम पर आ जाती और उन्हें भी इस बात की तसल्ली रहती की चलो हम अकेले नहीं है आम जन भी हमारे साथ है तो काबू पाना आसान हो जाएगा ?
असल में हिन्दू समाज इतना ज्यादा स्वार्थी हो गया है कि वो थोड़ा सा भी रिस्क नहीं लेना चाहता है उसे अपनी जान ज्यादा प्यारी है वो अपनी सुरक्षा के लिए भी दूसरों पर आश्रित है इनकी बहन बेटियों को भी कोई उठा ले जाए तो इनका खून नहीं खोलने वाला है सोचेंगे सुबह पुलिस में FIR करवा देंगे ढूंढकर लाना पुलिस की नैतिक जिम्मेदारी है इन लोगों के लिए दूसरे ही जिम्मेदारी निभाएंगे मगर इनकी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है
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