शनिवार, 9 मार्च 2019

काश तुमने अपनी कातिल निगाहों से देखा न होता

काश तुमने मुझे अपनी कातिल निगाहों से देखा न होता
तो में तुम्हारी मोहब्बत में इतना गिरा न होता

बुझा ही रहने देती तुम अपने मोहब्बत के चिराग को
कम से कम शमा की आग में परवाना जला तो न होता

में मानता हूं कुछ रिश्ता नही है तेरे मेरे दरम्यां में
फिर भी मेरी चाहत का एहसास तो किया होता

बड़ी ख्वाहिश रही मेरी तुम्हे जी भर देखे कभी
काश मेरा ये सपना कभी पूरा तो हुआ होता

बड़ी तकलीफे देती है गुजरी हुई यादें तुम्हारी
काश में तन्हा ही सही उम्र भर के लिए सोया ही हुआ होता

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