कहा भूलता है वो तुम्हारा मध्धम सा मुस्कराना
वो प्यारी सी नजरे झुका के हल्का सा सरमाना
एक मुद्दत बीत गई खोए ख्यालातों में तुम्हारे
काश लौट आये वो बचपन का गुजरा जमाना
कुछ न कुछ तो बांकी रह गया है तेरे मेरे दरम्यां
यूँही ही नही जलता है आग में मुझ सा परवाना
भले ही हो तुम्हारे पास हमे भूलने हजारों बहाने
में तो रखता हूं पास तुम्हारी यादों का खजाना