कोई न समझे जज्बातों को आशाओ की भी किरण नही
उच्च कोटि का है स्वार्थ इनका जिनका कोई छोर नही
कैसे मिटती इक इक आशा जिसका होता शोर नही
पल पल बढ़ती खामोशी में पहले बाला शोर नही
क्या कुछ पाया क्या कुछ खोया अब इसका कोई ज्ञान नही
चाहे करे कोई बात प्रेम की होता अब विश्वास नही
एक जो हम थे दूजे तुम थे लगते बिल्कुल गैर नही
अब बात तुम्हारी क्या करते जब खुद पर ही इतवार नही
सबक मिला मुझे उन लोगो से जिनमे था कोई गैर नही
छोड़ चले थे राह में मुझको फिर भी रहा कोई शिकवा नही
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