सोमवार, 7 जनवरी 2019

मन जो कही प्रोजेक्टर होता

मन जो कही प्रोजेक्टर होता
तो तेरे ऐब दिन में तो छुप जाते

जैसे ही होती रात अंधेरी तो
खुद ही एक्सपोज हो जाते

दिन दिन भर जो है कसमे खाते
होते ही शाम शर्मो शर्म मर जाते

कितना झूंठ बोलता है हर इंसान
खुलते भेद और हर भ्रम मिट जाते

खेल रहे है कैसे कैसे लोग जज्बातों से
देखता हर कोई और दंग रह जाते

अंदर से जो टूटे है चेहरे पर शिकन नही
अंदर की बाते बाहर देख लोग आह भर जाते

अच्छा हुआ जो मन प्रोजेक्टर नही
वरना लोग मुँह छुपाने कहा जाते

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