मन जो कही प्रोजेक्टर होता
तो तेरे ऐब दिन में तो छुप जाते
जैसे ही होती रात अंधेरी तो
खुद ही एक्सपोज हो जाते
दिन दिन भर जो है कसमे खाते
होते ही शाम शर्मो शर्म मर जाते
कितना झूंठ बोलता है हर इंसान
खुलते भेद और हर भ्रम मिट जाते
खेल रहे है कैसे कैसे लोग जज्बातों से
देखता हर कोई और दंग रह जाते
अंदर से जो टूटे है चेहरे पर शिकन नही
अंदर की बाते बाहर देख लोग आह भर जाते
अच्छा हुआ जो मन प्रोजेक्टर नही
वरना लोग मुँह छुपाने कहा जाते
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